July 18, 2018

इंसाफ दिलवाने के मामले में सबसे आगे बिहार

lawबिहार देश में सबसे ज्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट चलाने वाला राज्य बन गया है। पिछले महीने के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 179 फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रहे थे। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और गुजरात वे राज्य हैं जहां इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।

केंद्र अपनी योजना के तहत 1,800 ऐसे फास्ट्र ट्रैक कोर्ट की स्थापना करेगा जो कि वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं, बच्चों, विकलांगो के साथ हुए घृणित अपराधों की सुनवाई करने के साथ 5 सालो से ज्यादा समय तक लंबित पड़े प्रॉपर्टी विवादों और भूमि अधिग्रहण केसों की सुनवाई करेंगे।

इसके साथ ही केंद्र सरकार ने अगले 5 सालों में 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले ऐसे जिलों में जहां कि फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं है फैमिली कोर्ट की स्थापना करने का निश्चय किया है। इन कोर्टों के लिए फंड 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप दिया जाएगा।

साल 2000 में केंद्र सरकार ने राज्यों में 1734 फास्ट ट्रैक कोर्टों की स्थापना के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराए थे। हालांकि केंद्रीय सहायता 5 सालों के लिए 2011 तक फिक्स थी लेकिन फिर भी कुछ राज्यों जैसे बिहार, महाराष्ट्र और हिमाचल ने अपने खर्चों पर फास्ट टैक कोर्ट की स्थापना जारी रखी।

जो भी हो, केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा की अध्यक्षता में नैशनल मिशन फॉर जस्टिस डिलिवरी ऐंड लीगल रिफॉर्म्स की एक बैठक में तेजी से हो रही फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की स्थापना को गलत बताया गया है। विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एपी शाह के मुताबिक, इन कोर्ट्स से कुछ विशेष केसों में जहां तेजी आएगी वहीं पारंपरिक केसों के निपटान की गति धीमी हो जाएगी। उनके मुताबिक, पेंडिग केसों के लिए ज्यादा प्रभावी नजरिया अपनाना पड़ेगा।

दिल्ली में 2012 में निर्भया रेप मामले के बाद केंद्रीय कानून मंत्रालय ने इस तरह के केसों के लिए सालाना 80 करोड़ का बजट देने की तैयारी की थी। इस घटना के बाद ही केंद्र और राज्य सरकारों ने महिलाओं से संबंधित इस तरह के घृणित अपराधों के निपटारे के लिए ज्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की जरूरत महसूस की थी। कानून मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस उद्देश्य के लिए अब तक 212 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की स्थापना हो चुकी है।

Courtesy: Navbharat Times

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